Sunday, September 23, 2012

वोह जो लब्ज़ ख़ामोशी की गली मे बैठा हैं,
उसके रूठने से पहले वोह बात बाकी हैं,
नींद में नहीं, ख्वाबों में नहीं,
हर पल मे, हर रूह में समां जाए वोह।
फ़िर ना मज़बूर करना
ना ही दस्तक देना उस इम्तिहान को
फ़िर ना जाना यादों को तोड़ कर
हर वज़ह ही वोह वज़ह
एक नए सवेरे के उजाले की तरह
काश वो वक़्त वही थम जाता,
काश वो तःनियाह मुरझा ना पाती ,
काश ख़ामोशी के साथ आज हम तुम बह जाते,
काश इस घरी सासें अधूरी नहीं होती,
काश दिल फ़िर हमे पुराने मंज़िल को याद दिला जाता।

Saturday, October 15, 2011

हर घरी बस एक आवाज़ आई
जो  बेवजह दिल में शोर करे
और हर तरफ हम जल जाये
मुश्किलों के बीच उस तरफही मुर जाये
हर दस्तक बस उन परिंदों को याद करे

 

Tuesday, August 30, 2011

जब दिल में एक आवाज़ सी आये
कुछ मुस्कुराते कुछ सरसराते
हर दिन एक नया गीत गाये
सचाई से छीप छिपाते

एक लव्ज़ जो जबान पे ना आ पाए
किसी एक छोटे से कोने में गुनगुनाये
उस आवाज़ को फिर दस्तक देके हमने समझाया
फिर वही गीत गाने को हमने उसकाया